Friday, December 25, 2020

न मित आज माफी दे

 

तो बात कुछ ऐसे शुरू हुई कि

वो शख्स ना ही खास था

ना इतना रुह के पास था

फिर क्या हुआ गलत जो मेरे कारण वो उदास था

निराश था ये सोचकर कि सच को कैसे बोल दूं

हताश‌ था ये सोचकर कि दिल को कैसे तोड़ दूं

हां मोड़ दूं ये वक्त जो मेरे वश में हो अगर

हां तोड़ दूं गुरूर खुद का जो कभी रहा शिखर

प्रखर ये क्रोध ज्वाल बनके ग्लानि भरता जा रहा

मुखर जो होता था ये मुख अब शांत होता जा रहा

अशांत मन है तब से जब से मैंने उसको छल दिया

रच के मायाजाल उसके भाव को प्रबल किया

सबल दिया उसे जब वो भी करूणक्रुद्ध था

वो लड़ पड़ा सभी से आजतक जो कभी बुद्ध था

वो शुद्ध मन से अपने प्रीत को परास्त कर गया

था जो यकिन रखता मुझपर वो समाप्त कर गया

मुकर गया था मैं अपने आप की ही बातों से

और फंस गया था खुद ही खुद के मायाजाल बातों में

हां बात ऐसी थी कि खुद से नजर ना मिला सका

ना था इतना हौसला जो बात मन की सुना सका

तो लिख दिया है आज वो जो हाथ मेरा लिख सका

और दफ्न कर दिया वो बाकी बात जो न लिख सका

वो फिर भी भूलकर ये सारी बातें आज मिलता है

बिना शिकन शिकायतों के मुस्कुरा के मिलता है

वो खिलता है गुलज़ार करने सुबह के फुल की तरह

समझता है वो मुझको सुदामा के मित की तरह

रीत ये कि है बुरा वो चुप जब हो जाता है

अपने भावनाओं को वो यूं ही दबाता है

बताता नहीं है किसी को आदतें बुरी जो है

मैं चाहकर भी पूछ ना सकूं मेरी मजबूरी है


न मित आज माफी दे

न शीत दर्द काफी दे

ये जुर्रत नाइंसाफी की

न जीन इसकी हाफी दे

मुनाफिकी जो लेके चल रहा वो आज हार दूं

उसी जुनून से आज फिर विवेक मार दूं।

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