कुछ वक्त ही तो माँगा था तुमसे।
बहुत कुछ कहना था तुमसे
बहुत कुछ बताना था तुमको
जो जज़्बात कहीं अंदर जमीन में गड़े हुए थे
वो सब कुछ जताना था तुमको
कुछ अधूरी ख्वाहिशें रह गयी
कुछ अधूरी बातें रह गयी
हर वक्त इंतज़ार किया तुम्हारा
कुछ अधूरी मुलाकातें रह गयी
काश मैं ये सब बयान कर पाता तुमसे
कुछ वक्त ही तो माँगा था तुमसे।
कुछ सालों का साथ माँगा था तुमसे
कुछ पल भी न दे सके तुम
हर वक्त तुम्हें जानने की कोशिश की थी
कुछ हिस्सा भी नहीं जानने दिए तुम
तुम्हें खोजने की खातिर मैंने खुद को गवाँ दिया
तुम्हें पाने की खातिर मैंने खुद को खो दिया
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए कोशिशों की बारिश कर दी
तुम्हे खुश करने की खातिर मैं न चाहके भी रो दिया
काश ये जुर्रत कभी जता पाता तुमसे
कुछ वक्त ही तो माँगा था तुमसे।
दोस्ती हो या प्यार, दिल से किया था
जितना हो सकता था मुझसे, साथ दिया था
वक्त के आशियाने में तुम्हारे साथ के वो पल
जोश-ओ-खरोश और ज़िंदादिली से जिया था
शुक्रिया मेरे जज्बातों को दफ़्न करने के लिए
शुक्रिया मेरे अल्फ़ाज़ों में अग्न भरने के लिए
शुक्रिया मोहब्बत की असल तालीम देने के लिए
शुक्रिया फरेब की आँधियों में झोंक देने के लिए
नाउम्मीदी के सेहरे में उम्मीद की सराब दिखा गए तुम
शुक्रिया ज़िन्दगी भर की कसक देने के लिए
काश रूबरू होके सब बता पाता तुमसे
कुछ वक्त ही तो माँगा था तुमसे।
-विवेक