बस का इंतज़ार करते हुए , मेट्रो में खड़े-खड़े,
बस का इंतज़ार करते हुए , मेट्रो में खड़े-खड़े,
रिक्शा में बैठे हुए,
गहरे शून्य में क्या देखते रहते हो ?
गुम सा चेहरा लिए क्या सोचते रहते हो ?
क्या खोया, क्या पाया का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी.....
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।
हॉस्टल की उस 10*10 के कमरे में, घूमते हुए पंखे को देखते हुए,
कॉलेज की वीरान पड़ी क्लास में, चाक से ब्लैकबोर्ड भरते हुए,
हर वक्त किताबों से भरी लाइब्रेरी की एक कोने में पड़ी खाली चेयर में
किताब और सेलफोन साइड में रखे हुए,
कभी दोस्तों से भरे मेस की टेबल में
अकेले बैठे अपनी प्लेट लिए हुए क्या सोचते रहते हो ?
छुट्टियों में खाली हॉस्टल के बरामदे में घंटों अकेले क्या घूमते रहते हो ?
कौन साथ था और कौन नहीं था का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी.....
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।
PG की उस छोटे से कमरे में दिनभर अकेले समय बिताते हुए,
पार्क में अनजान लोगों की भीड़ के साथ बेतहासा चक्कर लगाते हुए,
बिना गाने के ईरफ़ोन कान में लगा, बेंच के किसी कोने में बैठे हुए,
बिना पलके झपकाए यूँ टकटकी लगाकर क्या सोचते रहते हो ?
अपने कमरे की बत्तियां बुझाकर खुली आँखों से अँधेरे में क्या देखते रहते हो ?
कितने साथ थे और कितना अकेले रह गए का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी...…
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।
सुबह के ब्रेकफास्ट और रात के डिनर के बॉक्स को खोलते हुए,
होटल के मेनू के लिस्ट में औकात के हिसाब से खाना ढूंढते हुए,
ठेले में लगे गुपचुप चाट को चाहकर भी इग्नोर करते हुए,
आइसक्रीम, मक्डोनाल्ड, सबवे और चाइनीज़ फ़ूड देखकर क्या सोचते रहते हो ?
दोपहर को लंच में मैगी के उबलते पानी में क्या घूरते रहते हो ?
कितना खर्चा बाहर खाने में और कितना मैगी खाने में लगा का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी.....
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।
दूसरों के घर के सामने सजी हुई रंगोली को देखते हुए,
बाज़ार की रौनक के बीचोंबीच गुमशुम से चलते हुए,
मिठाई की खुशबू को नजरअंदाज कर यूँ गलियों से गुजरते हुए.
पटाखों के शोर को इयरफोन के वॉल्यूम से दबाने की नाकाम कोशिश करते रहते हो ....
अपनी भावनाओं को दबाकर सबको शुभकामनाएं देते रहते हो...…
पिछले कुछ सालों की तरह दिवाली नहीं मना पाए न इस बार भी.......
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।
-विवेक


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