Saturday, October 26, 2019

एक कविता खुद के लिए भी : मेरी दिवाली




बस का इंतज़ार करते हुए , मेट्रो में खड़े-खड़े,
बस का इंतज़ार करते हुए , मेट्रो में खड़े-खड़े,
रिक्शा में बैठे हुए,
गहरे शून्य में क्या देखते रहते हो ?
गुम सा चेहरा लिए क्या सोचते रहते हो ?
क्या खोया, क्या पाया का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार  भी..... 
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।


हॉस्टल की उस 10*10 के कमरे में, घूमते हुए पंखे को देखते हुए,
कॉलेज की वीरान पड़ी क्लास में, चाक से ब्लैकबोर्ड भरते हुए,
हर वक्त किताबों से भरी लाइब्रेरी की एक कोने में पड़ी खाली चेयर में
किताब और सेलफोन साइड में रखे हुए,
कभी दोस्तों से भरे मेस की टेबल में
अकेले बैठे अपनी प्लेट लिए हुए क्या सोचते रहते हो ?
छुट्टियों में खाली हॉस्टल के बरामदे में घंटों अकेले क्या घूमते रहते हो ?
कौन साथ था और कौन नहीं था का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी..... 
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।


PG की उस छोटे से कमरे में दिनभर अकेले समय बिताते हुए,
पार्क में अनजान लोगों की भीड़ के साथ बेतहासा चक्कर लगाते हुए,
बिना गाने के ईरफ़ोन कान में लगा, बेंच के किसी कोने में बैठे हुए,
बिना पलके झपकाए यूँ टकटकी लगाकर क्या सोचते रहते हो ?
अपने कमरे की बत्तियां बुझाकर खुली आँखों से अँधेरे में क्या देखते रहते हो ?
कितने साथ थे और कितना अकेले रह गए का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी...… 
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।


सुबह के ब्रेकफास्ट और रात के डिनर के बॉक्स को खोलते हुए,
होटल के मेनू के लिस्ट में औकात के हिसाब से खाना ढूंढते  हुए,
ठेले में लगे गुपचुप चाट को चाहकर भी इग्नोर करते हुए,
आइसक्रीम, मक्डोनाल्ड, सबवे और चाइनीज़ फ़ूड देखकर क्या सोचते रहते हो ?
दोपहर को लंच में मैगी के उबलते पानी में क्या घूरते रहते हो ?
कितना खर्चा बाहर खाने में और कितना मैगी खाने में लगा का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी..... 
घर नहीं जा पाए न इस बार भी।



दूसरों के घर के सामने सजी हुई रंगोली को देखते हुए,
बाज़ार की रौनक के बीचोंबीच गुमशुम से चलते हुए,
मिठाई की खुशबू को नजरअंदाज कर यूँ गलियों से गुजरते हुए.
पटाखों  के शोर को इयरफोन के वॉल्यूम से दबाने की नाकाम कोशिश करते रहते हो .... 
अपनी भावनाओं को दबाकर सबको शुभकामनाएं देते रहते हो...… 
पिछले कुछ सालों की तरह दिवाली नहीं मना पाए न इस बार भी....... 
घर नहीं जा पाए न इस बार भी। 

-विवेक 



Tuesday, October 1, 2019

फादर ऑफ़ नेशन : भारत के राष्ट्रपिता

भारत देश विविधताओं से परिपूर्ण एक ऐसा देश है जो सनातन से इस विश्व में उपस्थित है। ना ही इसका जन्म हुआ है और ना ही ये कभी खत्म होगा। इस देश का नाम राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला देवी के पुत्र भरत के नाम पर "भारत" पड़ा। हिन्द महासागर और हिमालय पर्वत के मध्य के भूभाग होने की वजह से इसे "हिंदुस्तान" के नाम। से भी जाना जाता है। 

 आज का जो ज्वलंत मुद्दा है वो इस बात को लेकर है कि 5000 साल पुरानी इस सनातन सभ्यता के  देश का राष्ट्रपिता कौन है!? इस मुद्दे ने तूल इसलिए पकड़ा क्योंकि 24 सितम्बर 2019 को अमेरिका के टेक्सास शहर में हुए "हाऊडी मोदी" कार्यक्रम के पश्चात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्रेस वार्ता के दौरान यह कहा की भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक पिता की तरह देश का खयाल रखते हैं, इस लिहाज से वो भारत के पिता हैं।


  स्कूल की किताबों में हमें बचपन से यही पढ़ाया गया कि महात्मा गांधी हमारे देश के राष्ट्रपिता हैं किन्तु 2012 में सूचना के अधिकार के तहत भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि संविधान और इतिहास में कहीं भी उल्लेख नहीं है कि महात्मा गांधी देश के राष्ट्रपिता हैं। साथ ही साथ भारत के संविधान के अनुच्छेद 18 के अनुसार भारत के किसी भी व्यक्ति विशेष को भारत सरक़ार द्वारा कोई भी उपाधि नहीं दी जा सकती है। 


इस देश ने 1000-1200 साल की गुलामी देखी है। बहुत से आक्रांता, व्यापारी और शासक यहां किसी ना किसी परपेक्ष्य से आए, चले गए और कुछ यहां ही बसे रह गए। इस देश ने सबका स्वागत किया और सबकी यातनाओं को सहा भी। अंग्रेज़ भी भारत आए और उन्होंने भी यहां राज किया। उनके जाने के बाद लोगों ने ये भ्रम फैलाया कि भारत 15 अगस्त, 1947 को अंगेजों की दासता से आजाद हुआ है। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के मूल कारणों को इतिहास से दबा दिया गया, मिटा दिया गया।  देश को आजाद कराने के लिए हजारों- लाखों वीरों, स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकरियों ने अपना बलिदान दिया और जीवन खपाया। सभी लोगों ने देश को मातृभूमि मानकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी।
कुछ पंक्तियां अपने बचपन की स्कूल की कविताओं की लिखना चाहूंगा-
राम-कृष्ण, गौतम, गांधी, इसी धरा पर आए थे
महावीर, आजाद, भगत सिंह, निज कर्तव्य निभाए थे,
हम उनकी संतानें ऐसी, अपना फर्ज निभाएंगे
मातृभूमि प्राणों से प्यारी, इस पर बलि बन जायेंगे।
ये वो देश है जिसे हम "मां" कहकर पुकारते हैं। इस धरती पर पैदा होने वाला हर एक व्यक्ति "भारत माता" का पुत्र है। फिर ऐसा क्या हुआ कि महात्मा गांधी को देश का "राष्ट्रपिता" बना दिया गया?
ऐसा कौन सा महान कार्य महात्मा गांधी ने कर दिया कि लोग उन्हें "राष्ट्रपिता" कहने लगे? कहां से उत्पत्ति हुई ऐसे शब्द की? आइए इतिहास के कुछ पन्ने पलट के देखें।
जुलाई 1915 में, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार महात्मा गांधी के लिए "बापू" शब्द का इस्तेमाल किया था। "बापू" अर्थात "पिता" । और उसके बाद सभी उन्हें बापू कहकर पुकारने लगे। पूरे देश में जहां भी महात्मा गांधी जाते, लोग उन्हें आदरपूर्वक बापू कहकर पुकारते थे। इस प्रकार पूरे देश में ही उनका नाम "बापू" के नाम से प्रसिद्ध हो गया। अंग्रेजी में "बापू" को "फादर" कहते हैं।


आजादी की लड़ाई की इसी कड़ी में 21 अक्टूबर, 1943 को उत्तर - पूर्वी राज्य में एक वीर सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों को वहां की धरती से खदेड़ कर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उन्होंने "आजाद हिन्द सरकार" की स्थापना भी कर दी, अपना बैंक खोला, अपनी करंसी जारी की, नोट जारी किए, रेडियो खोला और पोस्ट ऑफिस तक खोला। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को उस "आजाद हिन्द सरकार" का प्रथम "प्रधानमंत्री" बनाया गया। इस सरकार और प्रधानमंत्री को उस समय के 11 देशों ने मान्यता दी जिसमें सोवियत संघ जैसा शक्तिशाली देश भी शामिल था। नेताजी ने 40 से 60000 की संख्या बल वाली "आजाद हिन्द फौज" खड़ी की जो अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए हरदम तैयार थी। 


द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने "भारत छोड़ो" आंदोलन की शुरुआत की। इसे आग देने का काम लाल बहादुर शास्त्री जी ने "करो या मरो" आंदोलन का रूप देकर किया। किन्तु हमारे देश के ही कुछ मक्कार और गद्दार लोगों ने इसकी खबर ब्रिटिश सरकार तक पहुंचा दी और देखते ही देखते सारे आंदोलनकारियों को जेल में बंद कर दिया गया जिसमें महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री भी शामिल थे।



 द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होते ही ब्रिटिश सरकार ने जून 1944 को महात्मा गांधी को जेल से रिहा कर दिया। इसके ठीक एक महीने बाद 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने देश और महात्मा गांधी को रेडियो के जरिए संदेश दिया। नेताजी ने स्पष्ट कर दिया था कि अहिंसा के बल पर देश को आजादी नहीं मिल सकती । चूंकि "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" आंदोलन बुरी तरह असफल हो चुका था, नेताजी ने अपने अंतिम पंक्तियों में महात्मा गांधी से आगे की लड़ाई के लिए उनके सहयोग और आशीर्वाद की कामना करते हुए कहा कि
"Father of our Nation in this holy war for India's liberation, we ask for your blessings and good wishes."
अर्थात 
"इस लड़ाई में भारत की आजादी के लिए हमारे राष्ट्र के बापू (पिता), से हम आपके आशीर्वाद और बधाई की कामना करते हैं।"


चूंकि महात्मा गांधी को पूरा देश बापू के नाम से जानता था इसलिए नेताजी ने उनके लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया।
और इसे ही ढाल बनाकर तथाकथित राष्ट्रवादी और सत्ताधारी लोगों ने महात्मा गांधी को "राष्ट्रपिता" का दर्जा दे दिया और इस झूठ को पूरे देश में फैलाया गया। उनकी मृत्यु के पश्चात महात्मा गांधी को महान साबित करने के जुनून में उस समय के दोगले और मक्कार लोगों ने हमारी मातृभूमि भारत का राष्ट्रपिता बना दिया। लेकिन भारत सरकार के संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि महात्मा गांधी इस देश के राष्ट्रपिता हैं। और वो कभी इस इस देश के राष्ट्रपिता हो नहीं सकते क्योंकि इस देश को हम मां कहकर पुकारते हैं और महात्मा गांधी इस देश के पुत्र हो सकते हैं, पिता नहीं। ना केवल महात्मा गांधी अपितु कोई भी इस देश का राष्ट्रपिता नहीं बन सकता ना हो सकता है। इस मातृभूमि में जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य इस माटी का लाल, बेटा, पुत्र हो सकता है किन्तु पिता नहीं। अतः देशवासियों से अनुरोध है कि वो किसी भी भ्रम और झूठ को ना माने और ना ही फैलाएं कि भारत का कोई राष्ट्रपिता है। 
जय हिन्द, वन्दे मातरम्


भारत देश आज २ अक्टूबर, 2019 को महात्मा गाँधी के जन्मदिन की 150 वी सालगिरह मना रहा है।
आज की युवा पीढ़ी आज के दिन को तीन ही कारणों से याद रखती है : पहला, आज गाँधी जयंती है , दूसरा , आज के दिन अवकाश होता है और तीसरा, आज के दिन "ड्राई डे" होता है अर्थात आज के दिन शराब के सारे  दुकान बंद होते है, शराब की बिक्री नहीं होती।
लेकिन लोग भूल जाते हैं कि आज के ही दिन हमारे देश के क्रन्तिकारी, देशभक्त नेता और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का भी जन्मदिन है। उनकी भी 115 वी सालगिरह है, ये कोई नही जानता। शास्त्री जी ने भी वो सारे काम किये थे जो महात्मा गाँधी ने किये थे, उन्होंने भी हर आंदोलन में हिस्सा लिया था, आज़ादी की लड़ाई में उनका भी बहुत बड़ा योगदान था और इस लड़ाई में उन्हें भी जेल जाना पड़ा था। "जय जवान जय किसान" का नारा देने  वाले शास्त्री जी को भुला दिया गया और एक षड़यंत्र के तहत उनकी हत्या कर दी गई।

खैर, वापस मुद्दे पे आते हैं। आज महात्मा गाँधी के उन महान कार्यों को देखते हैं जो हमें आज तक नहीं बताई  गई और हमें उनकी महानता को जानने से वंचित किया गया।

1) भारतवर्ष के इतिहास का सबसे बड़ा झूठ यह है कि भारत देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ था, उसके साथ एक और झूठ फैलाया गया कि हमें यह आज़ादी अहिंसा के दम पर मिली।  बल्कि सच तो यह है कि भारत देश 15  अगस्त 1947 को दो टुकड़ों में बंट गया और इस आज़ादी को प्राप्त करने में कुल 7 लाख 32 हज़ार क्रांतिकारी शहीद हो गए। और अहिंसा के झूठ को फ़ैलाने के लिए गाने तक लिख दिए गए, जिसे सत्ता के लालची लोगों ने बड़े जोर शोर से प्रसारित किया -

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल 
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। 

वास्तव में 15 अगस्त 1947 को सत्ता का  हस्तांतरण हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने यूनाइटेड किंगडम के  पार्लियामेंट में 18 जुलाई 1947 को भारत स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार ब्रिटिश शासित भारत को दो भागों (भारत और पाकिस्तान) में विभाजित किया गया और भारत की राजनितिक सत्ता को ब्रिटिश सरकार के अधीन लोगों में हस्तांतरित कर दिया गया।

२) महात्मा गाँधी की वकालत एक अहम् मुद्दा है जिसपर बात करना अनिवार्य है। महात्मा गाँधी 1888 में लन्दन चले गए अपने वकालत की पढाई करने और 1891 में वे भारत लौट आये किन्तु वकालत में उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली।  2 साल के  बाद आख़िरकार 1893 में 1 वर्ष के करार के तहत उन्हें दक्षिण अफ्रीका में वकालत का कार्य मिला। गौरतलब बात यह है कि 1 साल का करार कब 21 साल में बदल गए पता ही नहीं चला। 1914 में वे भारत लौट आये।
स्वामी श्रद्धानन्द एक शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। २३ दिसंबर 1926 को नया बाजार स्थित उनके निवास स्थान पर पर अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी ने धर्म-चर्चा के बहाने उनके कक्ष में प्रवेश करके गोली मारकर इस महान विभूति की हत्या कर दी। उनकी  हत्या के दो दिन बाद अर्थात २५ दिसंबर 1926 को गोहाटी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जारी शोक प्रस्ताव में जो कुछ कहा गया वह स्तब्ध करने वाला था। गाँधी के शोक प्रस्ताव के उद्बोधन में कहा कि
"मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा और मैं यह दोहराता हूँ। मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ। .... मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता। … हमें एक आदमी के अपराध के कारण पुरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए। मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ। … समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं हैं। "
ये बेहद शर्मनाक और निंदनीय बयान था। उन्होंने एक हत्यारे को फांसी से बचाने के लिए वकालत की किन्तु शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरोध में नेशनल असेंबली में उस जगह बम फोड़ा जहां किसी व्यक्ति विशेष को नुकसान नहीं हुआ, नारे लगाए और पर्चे बांटें, उनकी फांसी की सजा रोकने के लिये महात्मा गाँधी ने आगे आने की कोशिश नहीं की न ही उनकी वकालत की।
उनका यह स्वरुप किसी भी तरह से अनुचित और अकल्पनीय था।

महात्मा गाँधी को सेकुलरिज्म का इतना भूत सवार था कि उन्होंने श्री लक्ष्मणाचार्य द्वारा लिखे भजन के बोल तक बदल दिए। उस भजन के वास्तविक शब्द कुछ इस प्रकार थे -

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम 
सुन्दर विग्रह मेघश्याम, गंगा तुलसी शालग्राम 
भद्रगिरीश्वर सीताराम, भगत-जनप्रिय सीताराम 
जानकीरमणा सीताराम, जयजय राघव राजाराम। 

लेकिन महात्मा गाँधी ने इस भजन की लाइनों को ही बदल दिया -

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम 
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। 

मैं ये जानना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसा क्यों किया ? आखिर वो किसे खुश करना चाहते थे ?


3) दलितों के नेता डॉ. भीमराव आंबेडकर की कोशिशों के परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार द्वारा अछूतों के लिए एक नए संविधान के अंतर्गत पृथक निर्वाचन मंजूर कर दिया था। येरवडा जेल में बंद महात्मा गाँधी ने इसके विरोध में सितम्बर 1932 में 6 दिन का उपवास किया और सरकार को एक समान व्यवस्था (पूना पैक्ट) अपनाने पर मजबूर कर दिया। महात्मा गाँधी का मुस्लिम प्रेम इस कदर हावी था कि उन्होंने अपनी हठ के चलते अछूतों के पृथक निर्वाचन को नामंजूर करवा लिया और अछूतों का दिल जीतने के लिए दलितों के लिए "हरिजन" शब्द का इस्तेमाल किया जिससे डॉ. आंबेडकर नाराज थे और उन्होंने महात्मा गाँधी के इस कदम की निंदा की।

4) कुछ ऐसा ही वाकया 1938-39 में भी देखने को मिला। 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस को चुना गया किन्तु महात्मा गाँधी को सुभाष जी की कार्यशैली पसंद नहीं थी। 1939 में अध्यक्ष पद के चुनाव हुए जिसमे सुभाष जी पुनः चुने गए किन्तु महात्मा गाँधी की पसंद पट्टाभि सीतारमैया थे। महात्मा गाँधी ने पट्टाभि सीतारमैया की हार को अपना हार बताते हुए कांग्रेस  में फूट डाल दी जिसका परिणाम ये हुआ कि आखिर में तंग आकर सुभाष जी ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

5) 1942 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध हो रहा था तब महात्मा गाँधी ने "भारत छोडो" आंदोलन की शुरुआत की किन्तु ब्रिटिश सरकार को इस बात की भनक लगते ही उन्होंने महात्मा गाँधी को जेल में डाल दिया और यह आंदोलन बुरी तरह विफल हो गया।  द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जून 1944 को महात्मा गाँधी को जेल से रिहा किया गया। 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रेडियो द्वारा सन्देश दिया जिसमे उन्होंने महात्मा गाँधी के लिए कहा उसके कुछ अंश -
"इस लड़ाई में भारत की आज़ादी की लिए हमारे राष्ट्र के बापू (पिता) से उनके आशीर्वाद और बधाई की कामना करते है।"
चूँकि महात्मा गाँधी को पूरा देश बापू के नाम से जानता था इसलिए सुभाष जी ने उनके लिए "हमारे राष्ट्र  के बापू" शब्द का इस्तेमाल किया।  उनके इसी बयान को आधार बना कर भारतभूमि जिसे हम माँ या मातृभूमि कहकर सम्बोधित करते हैं, तथाकथित सत्ताधारी चापलूस लोगों ने महात्मा गाँधी को "भारत का राष्ट्रपिता" कह डाला और इसे इतिहास में ढिंढोरा बनाकर पीटा गया और सबको यह झूठ बताया गया। किन्तु भारत के संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि महात्मा गाँधी देश के राष्ट्रपिता हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार भारत सरकार किसी भी व्यक्ति को उपाधि नहीं दे सकती। अतः महात्मा गाँधी भारत देश के, जिसे हम माँ कहते हैं , पुत्र हो सकते हैं किन्तु पिता नहीं।

6) महात्मा गाँधी को ऐसा महान और चमत्कृत व्यक्ति के रूप में पढ़ाया गया है जिनके कहने मात्र से दंगाई अपने हथियार छोड़ दिया करते थे। उनके हठ के आगे बड़े बड़े नेता घुटने टेक दिया करते थे। 40 के दशक में ही धर्म के नाम पर देश के विभाजन की मांग उठ चुकी थी। मई 1947 के पहले ही यह तय हो गया था कि भारत का विभाजन तय है जिसके अनुसार एक भाग मुस्लिमों का होगा जिसे पाकिस्तान कहा जायेगा और दूसरा भाग भारत होगा जहां हिन्दू रहेंगे। मई 1947 में पाकिस्तान के हिन्दू भारत आने की तैयारी में थे तभी महात्मा गाँधी का बयान आया कि "अगर बंटवारा होगा तो मेरी लाश पर होगा..."
महात्मा गाँधी का बयान आते ही पाकिस्तान के हिन्दुओं को लगा की अब भारत का विभाजन किसी भी हालत में नहीं होगा, उनकी बात को कोई काट नहीं सकता था। हिन्दू भारत आना नकार देते हैं। इसका परिणाम यह हुआ की जिन्ना ने प्रत्यक्ष कार्यवाही की और  पाकिस्तान के मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारना शुरू किया।  इससे पहले की कुछ और होता जवाहर लाल नेहरू ने भारत के विभाजन पर हस्ताक्षर कर दिए और भारत दो भागों में बाँट दिया गया। जो हिन्दू पहले भारत आ सकते थे वो दंगों में फंस गए। इस प्रकार लाखों हिन्दुओं का क़त्ल कर दिया गया और उनकी लाशों को ट्रैन में लादकर भेज  दिया गया। विभाजन की इस त्रासदी में करीब 21 लाख लोगों की जान चली गयी। विडम्बना देखिये कि जो व्यक्ति अपनी हठ के लिए अनशन पर बैठ जाया करता था, अपनी बात मनवाने के लिए धरने पर बैठ जाया करता था, बड़े-बड़े नेताओं को झुका दिया करता था, वो नेहरू के सामने इतना लाचार था कि जब उसने विभाजन के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये तो उसके विरोध में कहीं भी धरना प्रदर्शन नहीं किया।  विभाजन को रोकने के लिए कहीं भी अनशन पर नहीं बैठे।  उनके  एक बयान के चलते लाखों लोग मरे गए किन्तु कुछ लोग अभी भी ये कहते हैं की अहिंसा से आज़ादी मिली। क्या महात्मा गाँधी को उन लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए ?

7) 15 अगस्त 1947 की तथाकथित आज़ादी के पश्चात जब भारत में प्रधानमंत्री पद का चुनाव हुआ तो प्रधानमंत्री पद के दो उम्मीदवार थे - जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल। सरदार पटेल को लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत मिला और जवाहर लाल नेहरू को केवल  एक मत जो कि उनका ही मत था। किन्तु यहाँ वापस महात्मा गाँधी ने अपना खेल खेला और कहा की नेहरू की हार मेरी हार है। सरदार वल्लभ भाई पटेल महात्मा गाँधी की इज्जत करते थे इसलिए इन्होने प्रधानमंत्री पद से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया गया।
महात्मा गाँधी का हठ और पक्षपात के चलते देश के बड़े बड़े महान नेताओं को उनके सामने झुकना पड़ा।

8) एक और बात हमें पढाई गई और बताया गया जिसका जिक्र मैं करना चाहूंगा। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी। गोडसे ने तीन गोलियां दागी और महात्मा गाँधी की हत्या कर दी। हत्या के बाद गोडसे न भागे न किसी और पर गोली चलाई।  गोडसे ने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें फांसी की सजा दे दी  गई।  लेकिन उनकी हत्या के बाद नन्दलाल मेहरा द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार महात्मा गाँधी के मुख से निकला अंतिम शब्द "हे राम"  था , लेकिन घटना के दौरान महात्मा गाँधी के ठीक पीछे खड़े कल्याणम ने कहा कि गोली लगने के बाद गाँधी के मुँह से एक भी शब्द निकलने का सवाल ही नहीं था।
ज़िंदगीभर मुसलमानों की तरफदारी करने वाले महात्मा गाँधी को अंततः हिन्दू बना दिया गया और किसी ने इस बात की जांच करने की आवश्यकता ही नहीं समझी कि मरते वक्त उनके मुँह से "हे राम" शब्द निकला भी था या नहीं। और इस झूठ को भारत के इतिहास के पन्नों में जोड़ दिया गया।

9) महात्मा गाँधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी जो आरएसएस का कार्यकर्ता था, अतः लोगों ने गाँधी जी की हत्या का दोष आरएसएस पर मढ़ दिया गया। मैं उन लोगों से महात्मा गाँधी की वो बात याद दिलाना चाहूंगा जो उन्होंने अब्दुल रशीद के लिए कहा था कि  "… हमें एक आदमी के अपराध के कारण पुरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए।" 
साथ ही मेरा एक और अनुरोध है कि आप सभी 1969 की कपूर कमिशन की उस रिपोर्ट को जरूर पढ़ें जिसमे महात्मा गाँधी की हत्या के षड़यंत्र के बारे में बताया गया है। कृपया आप वो रिपोर्ट अवश्य पढ़ें ताकि आपको यह पता चल सके की उनकी हत्या के पीछे किन किन लोगों का हाथ था और कौन कौन से संगठन और पार्टियां शामिल थी। 

10) अंततः एक और बात के साथ अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगा कि 2 अक्टूबर को भारत देश में गाँधी जयंती मनाई जाती है। आज का दिन "ड्राई डे" होता है अर्थात आज के दिन शराब की बिक्री नहीं होती।  मैं पूछना चाहता हूँ उन दोगले, मक्कार और झूठे लोगों से जो गाँधी जी के जन्मदिन पर तो "ड्राई डे" रखते हैं लेकिन सालभर गांधी जी के नोट को दिखाकर शराब खरीदते हैं। ये मक्कारी नहीं तो और क्या है।
महात्मा गाँधी बेशक एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने समाज सेवा के लिए कार्य भी किये हैं किन्तु हमें लाल बहादुर शास्त्री जी को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है जितना महात्मा गाँधी ने दिया है। शास्त्री जी का जन्मदिन भी 2 अक्टूबर को है। कहीं ड्राई डे और महान गाँधी जी के जयंती के चक्कर में उन्हें भूल न जाएँ।

"कहते हैं कि गाँधी को तो मार सकते हो किन्तु उनकी विचारधारा को नहीं " इस प्रकार का बयान देने वाले तथाकथित गाँधीवादी विचारधारा के लोगों से दूर रहें।  सत्य तो यह है की आज की तारीख पे कोई भी पूर्ण गाँधीवादी नहीं है और ना ही हो  सकता है। क्योंकि आज अगर इन्ही तथाकथित, झूठे और मक्कार गाँधीवादी में से किसी एक को थप्पड़ मार दिया तो मेरा विश्वास है की वो अपना दूसरा गाल आगे नहीं करेगा। 
अतः ऐसे लोगों से सावधान रहें, सुरक्षित रहें। 

ऐकला चलो-१ (सीधे मौत)

 When I was completely blank Filled with tons of uncertainty tank I chose this city for my survival And it gave me perception of revival  आय...