Thursday, February 14, 2019

Zinda Rehna Seekh Chuka Hoon Main

ज़िंदगी के 23 बरस देख चूका हूँ मैं ,
ऐ ज़िन्दगी ! ज़िंदा रहना सीख चूका हूँ मैं। 

सीख चूका हूँ कि कैसे ज़िन्दगी जीते हैं तन्हाइयों में ,
सीख चूका हूँ कि कैसे आगे बढ़ते हैं कठिनाइयों में ,
सीख चूका हूँ कि कैसे उठना है खुद की नज़रों में गिरकर ,
सीख चूका हूँ  कि  कैसे जीतना हैं खुद ही से हारकर ,
उन सभी लोगों का शुक्रिया जिन्होंने सही समय पर मुझे धोखा दिया है,
आज भीड़ में भी तन्हा जीना सीख चूका हूँ मैं ,
ऐ ज़िन्दगी ! ज़िंदा रहना सीख चूका हूँ मैं। 

सीख चूका हूँ कि कैसे और कब झूठ बोलना है ,
सीख चूका हूँ कि कहाँ और किसे सच बोलना है ,
सीख चूका हूँ कि दर्द में भी मुस्कुरा सकूं ,
अपने हर दर्द को अपनी हँसी में दबा सकूं, 
उन सभी लोगों को मेरा सलाम जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने से रोका है,
आज लड़खड़ाते हुए भी आगे बढ़ना सीख चूका हूँ मैं ,
ऐ ज़िन्दगी ! ज़िंदा रहना सीख चूका हूँ मैं। 

वो भी क्या दिन थे जब रोता था अकेले कमरे पे ,
वो भी क्या रातें थीं जब सोता था भूखे रहने पे ,
वो भी क्या  बारिश थी जो यादें लेके आती थी ,
वो भी क्या यादें थी जो आके ठहर सी जाती थी ,
अब दिन तो है लेकिन आँसू सूख चुके हैं ,
अब रात तो है लेकिन मर भूख चुके हैं ,
अब बारिश भी आती है तो तन्हाईयाँ साथ लाती हैं ,
अब यादें भी मुझे देख के अपना रुख मोड़ जाती हैं ,
हर उस सख्श को मेरा प्यार जिन्होंने मेरा साथ निभाया है ,
अब बिना प्यार के भी जीना सीख चूका हूँ मैं ,
ऐ ज़िन्दगी ! ज़िंदा रहना सीख चूका हूँ मैं।   

-विवेक 

ऐकला चलो-१ (सीधे मौत)

 When I was completely blank Filled with tons of uncertainty tank I chose this city for my survival And it gave me perception of revival  आय...