आफिस की खिड़की से बाहर जो झांका, बारिश आ गई
आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई
आंखों में सपने समेटे हुए आया था कुछ इस तरह से
कि कुछ कर गुजर जाउंगा मैं फिर इस जहां में
निकला था घर से मंजिल को पाने अकेला
चलते-चलते बेतहाशा पैरों में मोच आ गई
आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई
राहों में मिल गए जो मुसाफिर ऐसे जुड़ गए
चाहा था संग चलें पर रास्ते मुड़ गए
हंसना-रोना वो बाहों में सोना
वो हर पल सफर के सपने संजोना
सपनों के उजाले में काली घटा छा गई
आंखों की पलकें ऐसी रूकी कि यादें आ गई
ऐ बारिश तू आज रुकना नहीं
खुद को कुछ पल निहारने दे सही
भीगो लेने दे आंखों को बारिश में जरा
सफर के आखिरी मोड़ में हूं अकेला खड़ा....
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यही जिंदगी का फलसफा है फिर से दोहरा गई
आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई,
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आफिस की खिड़की से बाहर जो झांका....

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