Thursday, April 22, 2021

यादें आ गई


 आफिस की खिड़की से बाहर जो झांका, बारिश आ गई

आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई


आंखों में सपने समेटे हुए आया था कुछ इस तरह से

कि कुछ कर गुजर जाउंगा मैं फिर इस जहां में

निकला था घर से मंजिल को पाने अकेला

चलते-चलते बेतहाशा पैरों में मोच आ गई

आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई


राहों में मिल गए जो मुसाफिर ऐसे जुड़ गए

चाहा था संग चलें पर रास्ते मुड़ गए

हंसना-रोना वो बाहों में सोना 

वो हर‌ पल सफर के सपने संजोना

सपनों के उजाले में काली घटा छा गई

आंखों की पलकें ऐसी रूकी कि यादें आ गई


ऐ बारिश तू आज रुकना नहीं

खुद को कुछ पल निहारने दे सही

भीगो लेने दे आंखों को बारिश में जरा

सफर के आखिरी मोड़ में हूं अकेला खड़ा....

,

,

,

यही जिंदगी का फलसफा है फिर से दोहरा गई

आंखों की पलकें ऐसी रुकी कि यादें आ गई,

,

,

,


आफिस की खिड़की से बाहर जो झांका....

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