बढ़ चुकी है दूरियां इस कदर तेरे मेरे दरमियान ,
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
मिटा देना चाहता हूँ मैं यह फासले ताउम्र के लिए,
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
आज फिर दिन की शरुआत तुम्हारे नाम से हुई ,
आज फिर खुदा से गुफ्तगू तुम्हारे नाम की हुई ,
आज फिर तुम्हारे लिए अपने कपडे अस्तर किये ,
आज फिर तुम्हें देखने की चाह दिल में घर किये ,
भूल के सारा लिहाज, आज कह ही देना चाहता था तुम्हें कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हे, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
ये आँखें आज फिर तरस रही थी तुम्हारे दीदार को,
ये मन फिर मचल रहा था मिलने अपने यार को,
पथरा सी गयी थी नजरें, तुम्हे ढूंढते-ढूंढते,
ये 'दिल ' फिर तड़प रहा था, पाने अपने 'प्यार' को,
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल के, ये नजर-ए -ऐतबार करना चाहता था,
कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
दिन ढल रहा था और अरमान बिखर चुके थे,
तुमसे मिलने की हर आरज़ू मर चुकी थी,
एक हारे हुए मन के साथ लौट चला था मैं,
तुम्हें देख पाऊं यह ख्वाहिश, ख्वाहिश ही रह गयी थी,
कि किसी ने पुकारा मेरा नाम,
और मुझे फिर भी ध्यान आया तुम्हारा ही नाम ,
नजरें घुमाई तो आँखों में एक कसक थी,
तुम्हारी नजरें भी प्यासी थी मेरी एक झलक की,
वो पल रुक सा गया , वो पल थम सा गया
वो चाल थम सी गयी , वो दिल रुक सा गया
बस ये पल जीना चाहता था मैं,
बस तुम्हें ही देखते रहना चाहता था मैं ,
और फिर मिटाते हुए एक दूसरे की मृगतृष्णा,
टकरा गयी दोनों की आँखें एक दूसरे से,
और डूब कर एक दूसरे की आँखों में ,
मन की प्यास बुझाई एक दूसरे से,
मन के अंदर अल्फ़ाज़ों का तूफ़ान चल रहा था,
पर आज नजरें चुप थी , लफ्ज बंद था,
पता नहीं ये मेरा 'अहम्' है या 'स्वाभिमान'
कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हें की अब तुम्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं है मुझमें।
-विवेक
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
मिटा देना चाहता हूँ मैं यह फासले ताउम्र के लिए,
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
आज फिर दिन की शरुआत तुम्हारे नाम से हुई ,
आज फिर खुदा से गुफ्तगू तुम्हारे नाम की हुई ,
आज फिर तुम्हारे लिए अपने कपडे अस्तर किये ,
आज फिर तुम्हें देखने की चाह दिल में घर किये ,
भूल के सारा लिहाज, आज कह ही देना चाहता था तुम्हें कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हे, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
ये आँखें आज फिर तरस रही थी तुम्हारे दीदार को,
ये मन फिर मचल रहा था मिलने अपने यार को,
पथरा सी गयी थी नजरें, तुम्हे ढूंढते-ढूंढते,
ये 'दिल ' फिर तड़प रहा था, पाने अपने 'प्यार' को,
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल के, ये नजर-ए -ऐतबार करना चाहता था,
कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हें, कि अब तुम्हें कुछ कहने की भी हिम्मत नहीं है मुझमें।
दिन ढल रहा था और अरमान बिखर चुके थे,
तुमसे मिलने की हर आरज़ू मर चुकी थी,
एक हारे हुए मन के साथ लौट चला था मैं,
तुम्हें देख पाऊं यह ख्वाहिश, ख्वाहिश ही रह गयी थी,
कि किसी ने पुकारा मेरा नाम,
और मुझे फिर भी ध्यान आया तुम्हारा ही नाम ,
नजरें घुमाई तो आँखों में एक कसक थी,
तुम्हारी नजरें भी प्यासी थी मेरी एक झलक की,
वो पल रुक सा गया , वो पल थम सा गया
वो चाल थम सी गयी , वो दिल रुक सा गया
बस ये पल जीना चाहता था मैं,
बस तुम्हें ही देखते रहना चाहता था मैं ,
और फिर मिटाते हुए एक दूसरे की मृगतृष्णा,
टकरा गयी दोनों की आँखें एक दूसरे से,
और डूब कर एक दूसरे की आँखों में ,
मन की प्यास बुझाई एक दूसरे से,
मन के अंदर अल्फ़ाज़ों का तूफ़ान चल रहा था,
पर आज नजरें चुप थी , लफ्ज बंद था,
पता नहीं ये मेरा 'अहम्' है या 'स्वाभिमान'
कि
कैसे कहूँ मैं तुम्हें की अब तुम्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं है मुझमें।
-विवेक
awesome lines bro :)
ReplyDeletePyar Hai yeh
ReplyDeleteBro,
Deletetu ache se janta hai ki yeh pyaar ke baad ka hai....
tu jada cahe se relate karega